रावण और विष्णु भगवान का युद्ध - raavan aur vishnu bhagavaan ka yuddh

बहुत ही ज्ञानी था रावण। उसके तप और निष्ठा ने उसे एक महान ज्योतिषी भी बना दिया था। यही कारण है कि उसने ग्रह और नक्षत्रों को भी अपने वश में कर लिया था। उसके ज्ञान की बात इस घटना से पूरी तरह सिद्ध हो जाती है, जब स्वयं भगवान राम अपने छोटे भाई लक्ष्मण से कहते हैं कि जाओ लक्ष्मण रावण से कुछ ज्ञान और जीवन की सीख ले लो। उस समय रावण भगवान राम का वाण लगने के बाद युद्ध भूमि में जीवन की अंतिम सांसे गिन रहा था। लक्ष्मण अपने भाई श्रीराम की कोई बात नहीं टालते थे। इसलिए रावण को सख्त नापसंद करने के बाद भी वह श्रीराम के कहने पर रावण के समक्ष जाकर खड़े हो गए। लेकिन रावण कुछ नहीं बोला।

तब श्रीराम ने अपने भाई लक्ष्मण को समझाते हुए कहा, प्रिय अनुज! गुरु से ज्ञान हमेशा उसके चरणों के समीप रखकर ही ग्रहण किया जा सकता है। तुम रावण के शीश के समीप जाकर खड़े हो गए थे। जाओ, इस बार उसके चरणों की तरफ खड़े हो जाओ ताकि वह तुम्हें देख सके और अपने जीवन के अनुभवों का निचोड़ साझा कर सके। तब रावण लक्ष्मण को तीन अति महत्वपूर्ण बातें बताता है। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि रावण अपने आप में ज्ञान का भंडार था।

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एक बार रावण का घमंड उसके सिर पर इस कदर चढ़ गया कि वह स्वयं भगवान शिवशंभू से युद्ध करने पहुंच गया। रावण भगवान शिव का अनन्य भक्त था। लेकिन जब इंसान का बुरा समय आता है तो सबसे पहले विवेक उसका साथ छोड़ देता है। ऐसा ही कुछ हुआ था रावण के साथ। अपनी शक्तियों के घमंड में रावण भगवान शंकर से युद्ध करने के लिए कैलाश पर्वत पर जा पहुंचा। उसने भगवान शिव को युद्ध के लिए ललकारा। लेकिन जब शिवशंभू ने उसे कोई उत्तर नहीं दिया और ध्यान मग्न बैठे रहे तो रावण ने उन्हें कैलाश सहित उठाकर फेंकने का मन बनाया और वह पर्वत उखाड़ने लगा।

रावण की इस धूर्तता पर भगवान शिव ने केवल अपने अंगूठे के बल से कैलाश को स्थिर कर दिया और रावण का हाथ पर्वत के नीचे दब गया। रावण जितना ज्ञानी था उतना ही बलशाली भी था। लेकिन कैलाश पर्वत के बजन से उसके हाथ में दर्द होने लगा और वह पीड़ा से छटपटाने लगा। जब बहुत प्रयास के बाद भी रावण अपना हाथ नहीं निकाल पाया तो उसने वहीं खड़े-खड़े भगवान शिव की स्तुति की और शिव तांडव स्त्रोत की रचना कर दी। इस पर भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसे मुक्त कर दिया। तब रावण ने भगवान शिव से अपने कृत्य के लिए क्षमा मांगी और उनकी शरण में आ गया।

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Authored by

Parag sharma

| नवभारतटाइम्स.कॉम | Updated: May 4, 2022, 12:01 AM

लंकापति रावण त्रेता युग का सबसे हीन प्राणी के साथ-साथ एक ब्रह्मज्ञानी, कुशल राजनीतिज्ञ और बहु विधाओं का भी जानकार था। भगावन राम के साथ युद्ध में उसकी मौत हुई और मोक्ष की प्राप्ति की। ज्यादातर लोग जानते हैं कि रावण का युद्ध केवल श्रीराम के साथ हुआ था, जिसमें उसको हार मिली थी। लेकिन रावण केवल श्रीराम के हाथों ही नहीं हारा था बल्कि इससे पहले भी वह चार योद्धाओं के साथ युद्ध करके हार चुका था। एक योद्धा ने तो रावण को अपनी बाजू में दबाकर चार समुद्रों की परिक्रमा भी करवा दी थी। आइए जानते हैं कि राम के अलावा और किन लोगों से रावण हार चुका था...

  • बाजू में दबा लिया था रावण को

    रावण की सबसे पहली हार किष्किंधा के राजा बाली से हुई थी। राजा बालि को वरदान प्राप्त था कि उसके सामने जो भी युद्ध लड़ेगा, उसकी शक्तियां आधी हो जाएंगी। एकबार राजा बालि पूजा कर रहे थे तभी रावण युद्ध के लिए ललकारने लगा। राजा की पूजा में बार-बार विघ्न आ रहा था। इससे राजा बालि को गुस्सा आ गया और उसने अपनी बाजू में दबाकर चारों समुद्र की परिक्रमा करवा दी। रावण ने निकलने का बहुत प्रयास किया लेकिन विफल रहा। पूजा खत्म हो जाने तक राजा बालि ने रावण को बाजू में ही दबाकर रखा था। रावण ने राजा बालि से क्षमा मांगी, जिसके बाद उसे छोड़ा गया।

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  • नदी से ही रावण को हरा दिया

    सहस्त्रबाहु अर्जुन ने अपने गुरु दत्तात्रेय को प्रसन्न करके सहस्त्र भुजाओं का वरदान प्राप्त किया था। रावण अपनी सेना के साथ सहस्त्रबाहु अर्जुन के साथ युद्ध करने पहुंचा गया। तब सहस्त्रबाहु ने अपने हजारों हाथों से नर्मदा का पानी रोककर इकट्ठा कर लिया और फिर उसे छोड़ दिया, जिससे रावण अपनी सेना के साथ प्रवाह में बह गया और उसे हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद एकबार फिर रावण युद्ध के लिए पहुंचा गया तब सहस्त्रबाहु अर्जुन ने रावण को जेल में डाल दिया।

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  • बच्चों ने ही अस्तबल में बांध दिया

    रावण पाताल लोक पर कब्जा करना चाहता था लेकिन वह भूल गया था कि पाताल लोक में किसी अन्य लोक की शक्तियां काम नहीं करती। रावण पाताल लोक पहुंचकर राजा बलि को युद्ध के लिए ललकारने लगा। उसी समय वहां बच्चे खेल रहे थे। बच्चे रावण को देखकर आशर्चय में पड़ गए और उसे पकड़ने लगे। रावण अपनी शक्तियों का प्रयोग नहीं कर पा रहा था। बच्चों ने रावण को पकड़कर घोड़ों के अस्तबल में बांध दिया। जब यह घटना राजा बलि को पता चला तो तब उन्होंने रावण को बच्चों की कैद से मुक्त करवा दिया।

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  • भगवान शिव ने इस तरह युद्ध में हराया

    रावण भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। लेकिन रावण भगवान शिव से भी युद्ध करने चला गया। रावण कैलाश पर्वत पर पहुंचकर भगवान शिव को युद्ध के लिए ललकाराने लगा। लेकिन भगवान शिव ध्यान में लीन बैठे हुए थे। भगवान शिव का ध्यान भंग करने के लिए रावण कैलाश पर्वत को उठाने लगा। तब शिवजी ने अपने पैर के अंगूठे से ही कैलाश का भार बढ़ा दिया, जिससे वह कैलाश को उठा न सका, इससे उसका हाथ पर्वत के नीचे दब गया। बहुत प्रयत्न करने के बाद जब वह हाथ निकाल ना सका तो उसने शिव स्तुति की और शिव तांडव स्त्रोत की रचना कर दी। जिससे भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हो गए और उसको मुक्त कर दिया। मुक्त होकर उसने भगवान शिव को अपना गुरु भी बना लिया।

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